Sunday, January 25, 2015

राहें... Raahein...



कोठे पे आज बड़ी रौनक है, माहौल ऐसा के जैसे कोई त्यौहार हो। पर जिसके लिए ये रौनक है वो तो ऐसे दुबक के बैठी है जैसे कोई बकरा हलाल या बलि होने से पहले होता हो। आज उसकी पहली रात जो है। बोली लगेगी उसके जिस्म के पहले इस्तेमाल पे। 

उस कोठे की रौनक देख आज तीन जोड़ी पैर अलग अलग दिशाओ से बढ़ रहे हैं, उस भीड़ का हिस्सा बनने जो पहले ही वहां मौजूद है… 


राम की मेहनत आज बड़ा रंग लायी है, अपने संघ दल में आज बड़ी इज्ज़त कमाई है उसने। महंत जी ने कहा के धर्म और संस्कृति का सच्चा रक्षक बन गया है वो आज। विदेशी अश्लील प्रभाव में फंसे नव युवक-युवतिओं को आज उसने सही राह दिखाई। उनमे से एक तो कुछ ज़्यादा ही हीरो बन रहा था, अंग्रेजी में वो और उसकी माशूका न जाने क्या-क्या बोले जा रहे थे, "moral policing" जैसे बड़े बड़े शब्द। राम को गुस्सा तब आया जब उन्होंने हिन्दू धर्म के खिलाफ कुछ बोल दिया। यूँ तो राम को ये नहीं पता के उसके अपने माँ-बाप कौन है,  महंत जी ने उसे बचपन से पाला है। हिन्दू धर्म उसके लिए धर्म  नहीं, जीने का तरीका है।  महंत जी उसे दल में शामील करते समय बोला था के हिन्दू धर्म सबसे महान है, इसकी रक्षा देशी और विदेशी दोनों ताकतों से करना एक सच्चे हिन्दू का कर्त्तव्य है। 

गुस्से में राम ने उस लड़के-लड़की को डंडे और रॉड से खूब पीटा, उसके साथिओ ने भी उसका पूरा साथ दिया।  राम ने तो शायद उन्हें मार ही दिया होगा पर पुलिस आने से उन्हें वहां से जाना पड़ा।  महंत जी की प्रशंशा और साथिओ की वाह-वाही ने आज उसका सीना फुला दिया। आज रात तो फिर पार्टी बनती है। उन्ही साथिओं से उसने सुना के कोठे पे आज कोई नया माल आया है...


अहमद को आज कुछ  अलग बोटी की तलाश है, रोज़-रोज़ जानवरों को हलाल करते-करते आज उसमे एक अलग जानवर की भूख़ सवार हो गयी थी। इन्सानी जिस्म की भूख कुछ अलग ही होती है, बिल्कुल वैसे ही जैसे एक जानवर को हलाल करने और एक इंसान की गर्दन काटने में होता है।  अहमद को ये फरक तो उस रोज़ ही पता चल गया था जिस रोज़ पिछले दंगो में उसने पहली बार एक इंसान को हलाल किया था।  मौलवी साहब ने कहा था के काफ़िर की जान लेना अल्लाह की इबादत है, और सच्चे मुसलमान का फ़र्ज़। उनकी बात तो अहमद के लिए अल्लाह का फरमान था।

अहमद की हवस की भूख आज वैसे ही उसपे सवार थी जैसे उस दिन उसके सर खून सवार था। ये एक ऐसी भूख थी जो उसकी बीवी नहीं मिटा पा रही थी अब। उसे लगा था दूसरी शादी करते वक़्त की उसकी हवस नई बीवी मिटा देगी। आखिर १७ साल की कमसिन कली थी वो। उसे देखा था पहली बार जिसदिन उसी दिन से उसे पाने की ज़िद सवार हो गयी थी. पता करने पे पता लगा के वो तो रिश्तेदारी में ही है। उसके अब्बु भी कोई कमाऊ लड़का खोज रहे है उसके लिए, पर दहेज़ लायक उनके पास कुछ नहीं था अपनी पांच और बेटियों की शादी कराने के बाद। फिर क्या था बस तीन अल्फ़ाज़ बोलने जितना ही वक़्त लगा उसे पहली बीवी छोड़ नयी बीवी घर लाने में।  आखिर दूसरी शादी करना कोई गुनाह तो नहीं, उसके अब्बा ने तो तीन-तीन शादियां करी थी एक वारिस की आस में। पर जब फिर भी खुदा की नेमत ना हुई और हकीम साहब ने बताया के उनसे बच्चा न होगा तो एक रात चुपके से अहमद को गोद ले लिया।  अपनी तरह पांच वक़्त का नमाज़ी, एक सच्चा मुसलमान बनाया।

अहमद की दूसरी शादी को साल भर से उपर हो गए अब तो, उसकी बीवी ने दो महीने पहले ही अहमद के बच्चे को जन्म दिया। गुज़रे वक़्त और बच्चे के बाद अब उसकी बीवी की कशिश भी जाती लग रही थी अहमद को।  अब उसमे वो गर्मी नहीं रही जिसकी अहमद को भूख हो। उपर से बच्चे की तीमारदारी में उसे वक़्त ही कहां शौहर के लिए?! आज दूकान पे जब कुछ ग्राहकों की बातों से पता चला के लाइन पार कोठे पे एक नयी बकरी हलाल होने को है, तो सुनके अहमद की रगों में फिर से वही गर्म खून उबल गया और दूकान बंद कर उसके कदम घर की जगह कोठे की राह बढ़ चले...


जॉन को अभी उसके जानने वाले शायद पहचान भी ना पाये। वो जो चर्च का छोटा पादरी था आज एक अलग भेस में था। आज उसकी मंज़िल चर्च नहीं कही और थी। आज रात उसके कदमों की सुबह ही तय हो गयी थी, जब कॉन्फेशन बॉक्स में वो बैठा उस औरत की बात सुनने।

आज चर्च के बड़े पादरी जिन्होंने जॉन को बचपन से पाला था वो बीमार थे तो उनकी जगह जॉन चर्च के कार्यक्रमों का संचालन कर रहा था।  जब वो औरत जो यूँ तो क्रिस्चियन नहीं लग रही थी वहां आयी और कॉन्फेशन बॉक्स की तरफ बढ़ी तो जॉन ने बड़े पादरी की जगह वहां भी ली। उसकी बातों से पता चला के वो औरत पास के कोठों में से एक से आई वेश्या थी।  उसे आज वक़्त ने बड़े अजीब मुकाम पे ला खड़ा किया था।  आज उसकी बेटी की पहली रात थी। उस औरत की बिल्कुल मर्ज़ी नहीं थी की उसकी बेटी भी ये गन्दा काम करे, उसके जिस्म को भी लोग नोच खाए जैसे सालों से उसकी माँ के साथ हुआ। पर एक वेश्या की बात कब कहाँ सुनी गयी! ना उस दिन जिस दिन उसे उस कोठे पे बेचा गया था, ना उस दिन जब जब उसके तिड़वा बच्चों को उससे छीन के न जाने कहाँ दे दिया गया। आखिर एक कोठे पे मर्दजात बच्चों का क्या काम? काश आज उसके तीनों बेटे उसके साथ होते तो शायद अपनी बहन को यूं सरे बाजार नीलाम ना होने देते। इन्हीं गमो में डूबी वो बेबस औरत अपने और अपने बच्चों की किस्मत पर रो रही थी।

उस रोती हुई औरत की कहानी में मगर जॉन को एक अलग सा मज़ा मिला। कुंवारी लड़किओं का शौक था उसे, और पादरी होते हुए ऐसे मौके उसे रोज़ कहाँ मिलते हैं।  पिछली बार एक जवान नन के चक्कर मे वो पकड़े जाते-जाते बच गया था। वो नन मां बन गयी थी। बात फादर को पता चले या बाहर जाये, इसके पहले ही जॉन ने उस नन को एक रात दूर गाँव ले जाकर मार दिया। जॉन को तो बस कुंवारी का नयापन और मासूमियत पसंद थी, उसी को लूटने में उसे मज़ा आता था। अपने इस शौक को पूरा करने के मौके कम ही आते थे।  वो तो बस कभी-कभी चर्च में साफ़-सफ़ाई के लिए आने वाले गांव के लड़को तक से काम चला लेता था। आज फिर मगर महीनो बाद एक कुंवारी लड़की का मज़ा लेने का मौका मिला है। आज वो किसी कीमत पे ये मौका नहीं छोड़ेगा।  बोली चाहे कितनी भी लगे उसकी बोली सबसे ऊपर होगी। ...


बाजार अब अपने शबाब पे है, ख़ास खरीदारों का स्वागत करते हुए।  देखना ये है अब कौन लगायेगा सबसे बड़ी बोली?!



Roman Script:



Kothe pe aaj badi ronak hai. Mahaul aisa k jaise koi tyohar ho. Par jiske liye ye ronak hai wo to aise dubk ke baithi hai jaise koi bakra halal ya bali hone se pahle hota ho! Aj uski pahli raat jo hai! Boli lagegi uske jism k pahle istemaal pe.

Us kothe ki ronak dekh aj 3 jodi pair alag alag dishao se badh rahe hai, us bheed ka hissa banne jo pahle hi waha maujood hai...

Raam ki mehnat aj bada rang layi hai, apne sangh dal me aaj badi ijjat kamai hai usne. Mahant ji ne kaha k dharm aur sankriti ka sachcha rakshak ban gaya hai wo aj. Videshi ashleel prabhav me fase kai nav yuvak-yuvatio ko aj usne sahi raah dikhai. Unme se ek to kuch zyada hi hero ban raha tha, angereji me wo aur uski mashooka na jane kya-kya bole ja rahe the, "moral policing" jaise bade bade shabd. Raam ko gussa tab aya jab unhone Hindu dharam k khilaf kuch bol dia. Yun to raam ko ye nahi pata k uske apne maa-baap kon hai par bachpan se hi Mahant ji ne use bachpan se pala hai. Hindu dharm uske lie dharm nahi jine ka tarika hai. Mahant ji use dal me shamil karte waqt bola tha ke Hindu dharm sabse mahaan hai, iski raksha deshi aur videsi dono takato se karna ek sachche Hindu ka kartavya hai.

Gusse me raam ne us ladke-ladki ko dande aur rod se khub pita, uske sathio ne bhi uska pura sath diya. Raam ne to shayad unhe maar hi dia hoga par police k aane se unhe janna pada. Mahant ji ki prashansa aur sathio ki Waah-wahi ne aj uska seena fula dia. Aj to raat fir party banti hai. Unhi sathio se usne suna ke kothe pe aj koi naya maal aya hai...


Ahmad ko aj kuch alag boti ki talaash hai, roz-roz janwaro ko halaal karte-karte aj usme ek alag janwar ki bhookh sawar ho gayi thi. Insani jism ki bhook kuch alag hi hoti hai, bilkool waise hi jaise ek janwar ko halal karne aur ek insaan ki gardan katne me hota hai. Ahmad ko ye fark to us roz hi pata chal gaya tha jis roz pichle dango me usne pahli baar ek insaan ko halaal kia tha. Maulvi sahab ne kaha tha ke kafir ki jaan lena allah ki ibadat hai, aur sachche musalman ka farz. Unki baat to Ahmad k lie allah ka farmaan tha.

Ahmad ki hawas ki bhook aj waise hi uspe sawar thi jaise us din uske sir khoon sawar tha. Ye aisi bhook thi jo uski biwi nahi mita pa rahi thi ab. Use laga tha dusri shaadi karte waqt ki uski hawas nayi biwi mita degi. Akhir 17 saal ki kamsin kali thi wo. Use dekha tha pahli baar jisdin usi din se  use pane ki zid sawar ho gayi thi. Pata karne pe pata laga ke wo to rishtedari me hi hai. Uske abbu bhi koi kamau ladka khoj rahe the uske liye, par dahej layak unke pas kuch nahi tha apni paanch aur betio ki shaadi karane kebaad. Fir kya tha bas teen alfaaz bolne jitna hi waqt laga use pahli biwi chod nayi biwi ghar lane me. Akhir dusri shaadi karna koi gunaah to nahi, uske abba ne to teen-teen shaadiya kari thi ek waris ki aas me. Par jab fir bhi khuda ki nemat na hui aur hakeem sahab ne bataya k unse baccha na hoga to unhone ek raat chupke se Ahmad ko god le lia. Apni tarah 5 waqt ka namaazi, ek sachcha musalman banaya.

Ahmad ki dusri shaadi ko saal bhar se upar ho gaye ab to, uski biwi ne do mahine pahle hi Ahmad k bacche ko janm dia. Waqt aur bacche k baad ab uski kashish bhi jaati lag rahi thi Ahmad ko. ab usme wo garmi nahi rahi jiski use bhook ho. Upar se bacche ki timardari me use waqt hi kahan shohar k lie?!. Aj dukaan pe jab kuch grahako ki baaton se pata chala ke line par kothe pe ek nayi bakri halal hone ko hai, to sunke Ahmad ki rago me firse wahi garm khoon ubal gaya aur dukaan band kar uske kadam ghar ki jagah kothe ki raah badh chale...


John ko aj uske janne wale shayad pahchan bhi na paye. Wo jo church ka chota padri tha aj ek alag bhes me tha. Aj uski manzil church nahi kahi aur thi. Aj raat uske kamdo ki disha subah hi tay ho gayi thi, jab confession box me wo baitha us aurat ki baat sunne.

Aj church ke bade padri jinhone use bachpan se pala tha wo bimar the to unki jagah John church ke karyakramo ka sanchalan kar raha tha. Jab wo aurat jo yun to Christian nahin lag rahi thi waha ayi aur confession box ki taraf badhi to John ne bade padri ki jagah wahan bhi li. Uski baton se pata chala ke wo aurat pas k kotho me se ek se ayi veshya thi. Use aj waqt ne bade ajeeb mukam me la khada kia tha. Aj uski beti ki pahli raat thi. Us aurat ki bilkool marzi nahi thi ki uski beti bhi ye ganda kaam kare, uske jism ko bhi log noch khaye jaise salo se uski maa k sath hua. Par ek veshya ki baat kab kahan suni gayi. Na us din jis din use us kothe pe becha gaya tha, na us din jis din uske tirwa baccho ko usse cheen k na jane ka de dia gaya tha. Akhir kothe pe mardzaat baccho ka kya kaam? Kash aj uske teeno bete uske sath hote to shayad apni behan ko yun sare bazaar neelaam na hone dete. Inhi gumon me doobi wo bebas aurat  apne aur apne baccho ki kismat per ro rahi thi.

Us roti aurat ki kahani ne magar John ko ek alag sa maza mila. Kunwari ladkio ka shauk jo tha use, aur padri hote hue aise mauke use roz kaha milte hai. Pichli baar ek jawan nun ke chakkar me wo pakde jate jate bach gaya tha. Wo nun ma ban gayi thi. Baat father ko pata chale ya bahar jaye, iske pahle hi John ne us nun ko ek raat dur ganv le ja ke maar dia. John ko to bas kunwari ka nayapan aur masumiyat pasand thi, usi ko lutne me use maza ata tha. Apne is shauk ko pura karne ke mauke kum ate the. Wo to bas kabhi-kabhi church me saf-safai ke liye ane wale ganv ke ladko tak se kaam chala leta tha. Aj fir magar maheeno baad fir ek kunwari ladki ka maza lene ka mauka mila hai. Aj wo kisi keemat pe ye mauka nahi chodega. Boli chahe kitni bhi lage uski boli sabse upar hogi...


Bazaar ab apne shabab pe hai, khaas kharidaro ka swagat karte hue. Dekhna ye hai ab kon lagayega sabse badi boli!

Thursday, December 18, 2014

Where is he?



Where is he...
in whose name people put their faith and life,
in whose name both saints and demons come alive,
in whose name men are divided from men,
in whose name blood flows faster than water,
in whose name children are baptised or butchered,

No matter the name, no matter the face,
Under his almighty gaze,
Innocent suffer, flourishes hate,
The search goes on...
Long live his grace!

Thursday, October 2, 2014

সেই রাত - (That Night)

Throwback Thursday... This story I had written as a high-school student almost 17 years back in October of 1997 for my school magazine. The story was meant as an homage to the people who died in the 'Upahaar Cinema Fire' at Green Park, New Delhi on Friday, 13 June 1997. 



উঃ ! এই শীতের রাতেও ঘেমে-ঘেমে সব জামা কাপড় ভিজে গেল। আর হবে নাই বা কেন, পুলিশের তাড়ায়ে যে সেই ঘন্টা খানেক থেকে গলি-গলি দিয়ে পালিয়ে বেড়াচ্ছি। চার দিন আগে শেঠ ধনিরামকে খুন করে বেশ কিছু  টাকা আর গয়নাগাটি নিয়ে পালালাম। সেই থেকে পুলিশের ভয়ে নিজের একটা গুপ্ত আস্তানায় লুকিয়ে ছিলাম এত দিন। যা খাবার-দাবার সেখানে ছিল সে সব দুদিন পরেই শেষ  গেল। তাই আজ আর না থাকতে পেরে সাহস করে বেরিয়ে গেলাম কিছু খাবার-দাবার কিনতে কম্বল ঢাকা দিয়ে। 

কিন্তু আজ আমার কপালটাই মন্দ। না জানি কি করে যেই দোকানে আমি পাউরুটি ইত্যাদি কিনতে গেছি সেই দোকানেই এক হাবিলদার একটা কুকুর নিয়ে  ঢুকেছে। কুকুরটা আমাকে দেখতেই পুরসরে চেঁচাতে শুরু করে দেয় আর সোজা আমার ওপর ঝাঁপ দেয়। ওর গলার চেনটা হাবিলদারের হাথে থাকার জন্য ও ঠিক আমার ওপের উঠতে পারল না। কিন্তু ওর ঝাপে আমার কবলের একটা কোনা ওর মুখে এসে গেল আর তাতেই সেই কোনটা ধরে এক টান দিল। টান পরতেই কম্বলটা আমার গা থেকে নেমে এলো। আমার আসল চেহারা সবার সামনে আসতেই হাবিলদারটা আমায় কিভাবে যেন চিনে ফেলল। চেনামাত্রই সে দিল তার হুইশিলে ফু আর কুকুরটাকে আমার পিছনে লেলিয়ে দিল। কি আর করব, পরি কি মরি করে পালালাম সেখান থেকে। কুকুরটার থেকে বাঁচতে গিয়ে আমার অবস্তা কাহিল হয়ে গেল। ততক্ষণে আবার বেশ কয়েকটা পুলিশ জীপ্ আমার পিছনে লেগে গিয়েছে। বেশ বুঝতে পারছিলাম সারা শহরের পুলিশ সতর্ক হয়ে গেছে। 

অনেক কষ্টে গলি ঘুপচি দিয়ে পালিয়ে আমি এখানে এই গলিটার কোনে এসে পরে মনে হলো বেছে গেছি। কিন্তু একী, আবার পুলিশ জীপের সাইরেনের আওয়াজ শুনতে পাচ্ছি যে!!! আরে, ওখানে যে খুব আলো দেখতে পাচ্ছি। ওখানে তো সেই সিনেমা হল-টা আছে না যেটা এই বছর খানেক আগে জ্বলে-পুড়ে ছাই হয়ে গিয়েছিল। সেই ভয়ংকর অগ্নিকান্ডে অনেকজন মারা গিয়েছিল। তারপর থেকে তো এই হলটা বন্ধ ছিল, কবে আবার ঠিক-ঠাক হয়ে চালু হল। অবশ্য আমি তো মাস দুই শহরের বাইরে ছিলাম আর এখানে এসেই তো এই  ঝন্ঝাটের মধ্যে আটকে পরলাম। হয়ত এই মাঝেই এটা আবার শুরু হয়েছে। এই সব ভাভছি কি হটাথ পুলিশের জীপের শব্দ কানে পড়ল, বুঝলাম ওরা একদম কাছে এসে পড়েছে। এবার বাঁচবার একটাই উপায়, এক সিনেমা হাল্টাতেই ঢুকে পড়ি। 

এখনও লাস্ট শো শুরু হয়ে বেশিক্ষণ হয়েনি। এতক্ষণ কাস্টিং চলছিল। টিকেট কাউন্টারের  লোকটা  ভারী অদ্ভূত লাগলো আমার। একটা কম্বল দিয়ে সারা গা-মাথা পর্যন্ত ঢাকা। সে যখন আমাকে টিকেট-টা দিল তখন অর হাথটার এক ঝলক দেখেই আমার গা গুলিয়ে উঠল। ওর হাথটা এমন ভয়ংকর ভাবে জলে গেছে যে অনেক জায়গায় ভেতরের হাড় পর্যন্ত দেখা যাচ্ছে। বোধহয় সেই অগ্নিকান্ড তেই ওর এমনি অবস্থা হয়েছে। যাক এখন এই সব চিন্তা না করে ফিল্মটায় মন দি। কিন্তু চাইলেই কি আর মন বসানো যায়। দুদিন ধরে পেটে একটি দানাও পড়েনি আর এর পরেও যে কিছু পড়বে তারও কোনো আশা দেখতে পাচ্ছি না। সবের ওপর আবার সেই পুলিশের ঝন্ঝাট। আরে ওই তো একটা ছেলে ট্রে-তে করে  কি সব খাবারের জিনিস নিয়ে যাচ্ছে। ওকে ডাকি, ওর কাছে যদি কিছু পাওয়া যায়। আরে ভাভতে ভাভতেই দেখি ও চলে যাচ্ছে, তাড়াতাড়ি ধরি ওকে। 

আরে! এ  আমি কি দেখছি... ইন্টার্ভেলের আলো জ্বলে যেতেই, আমি একি দেখছি... এই ছেলেটার গায়ে তো মাংশ বা চামড়া কিছুই নেই। দুই চক্ষু কঠরের মধ্যে একটার থেকে আবার মাংসের দলা মত বেরিয়ে রয়েছে। উফ! কি বিভৎস!

আরে একি ! এই হল-এ কারা বসে আছে, এরা কি মানুষ, না প্রেতাত্মা! 

উঃ! আমি আর এখানে থাকতে পারছিনা, আমায় এক্ষুনি এখান থেকে পালিয়ে যেতে হবে... 

ঐ যে, ওরা নিজেদের সিট ছেড়ে উঠে আসছে আমারি দিকে। এরা যে সবাই জীবন্ত কঙ্কাল। কেউ পুরোপুরি কঙ্কাল, যাদের গায়ে এক ফোঁটা মাংশ বা চামড়ার চিহ্ন নেই, আর অন্যদের গায়ে কথাও-কথাও  লেগে রয়েছে পোড়া মাংশ  আর চামড়ার অবশেষ। কারো আবার চোখের কোটর থেকে বেরিয়ে এসেছে মাংশের দলা, অন্যদের চোখের লেশমাত্রও নেই। 

না, এবার এখান থেকে পালাতেই হবে। কিন্তু আমি পালাবো কোথা দিয়ে? এই হলে স্রেফ একটাই দরজা খোলা রয়েছে আর তারই সামনে রয়েছে বালকনিতে যাবার স্নিরি। আর সেইদিয়ে নেমে আসছে আরো অনেক নরকঙ্কাল। আমার পালাবার রাস্তা বন্ধ সবদিক দিয়ে। ওরা আমায় ঘিরে ফেলেছে চারিদিক দিয়ে। হল-এ ঢোকা মাত্র যে হালকা এক গন্ধ পেয়েছিলাম আবার আমি সেটা চিনতে পেরেছি। খুব চড়া ভাভে আসছে এবার সেই গন্ধ, পোড়া মৃতদেহের গন্ধ! 

উঃ! আমার গা গুলিয়ে বমি আসছে, আমার হটাত বুকে খুব ব্যথা শুরু হয়েছে, মাথা ঝিম-ঝিম উঠছে, আমি টলে-টলে পরে যাচ্ছি...

হাঁ, আমি এখন সেই প্রেতাত্মাদের  সাথে বসেই ফিল্ম দেখছি। আমি আর ওদের ভয় করিনা। ওদের নিয়ে আমার আর কোনো অস্বস্তিও নেই। কারণ...কারণ আমি এখন ওদেরই একজন, আমিও এখন একটি প্রেতাত্মা। 

কাল সকালে হয়ত পুলিশ আবিষ্কার করবে আমার মৃতদেহ। এক সিনেমা হলের ধ্বংশাবশেষের স্নিরিতে। তার পোস্টমর্টেম করলে ওরা জানতে পারবে যে আমার মৃত্যু হয়েছে প্রচন্ড ভয় পেয়ে হার্টফেল কোরে। কিন্তু কেউ জানতে পারবে না যে কি দেখে আমার চোখ এমন ছানাবড়া হয়েছিল মৃত্যুর সময়, কি দেখে এত ভয় পেল একটি দাগী চোর, খুনে! কেউ জানতে পারবে না আমার 'সেই রাতের' সেই ভয়ংকর অভজ্ঞতার কথা।।

Sunday, June 8, 2014

Regret(s)


It was an ordinary weekend for Ravi. Wandering aimlessly in a city he still felt like an alien even after six years. As he boarded one of the last metro-trains, his mobile conked off as usual and he got irritated thinking of being bored for the next 25 minutes sitting idle. The train was empty; no one for him to observe and analyse as he often did to pass time. It was among the last trains that ran pretty late in the night, not on a very heavy traffic line and it was a weekend when almost everyone in the city was busy somewhere shedding the fatigue of mind and body off them.

Just as Ravi was readying to sit for the solitary journey home he saw her running down the stairs in a mad hurry to race against time. She jumped off two steps at a time; her hair sticking to her pretty face with the sweat due to the effort and a little panic in her big doelike eyes. In a sudden rush of who knows what, Ravi went to the door of the train putting himself between the doors, caught the girl’s hand and pulled her in the train just as the door started closing in. As she stood catching her breath holding the rod beside the seats, he thought of the moment or the fraction of it- quite Bollywoodish, no one might believe it and even he was having hard time believing that such a thing would happen to him; not that he was a dreamer or romantic for that matter. 

The proof of it all came just then as Ravi heard her say thank you for his help. The train had gotten lost in the tunnels at optimum speed and she had started her story at a faster pace without him asking anything. Her voice mesmerizing, her smile captivating and her laugh even more so… She had gone to this movie of the new heartthrob she desperately wanted to see with a couple of her friends and their boyfriends (no mention of her own was a bit satisfying somewhere in Ravi’s mind). She would not normally be allowed to go for a late show had her father been in town. But she needed to get back home asap; her mother was worried for her and if she wasn’t home by the time her Dad called, it would be a havoc when he came back the next day.

Ravi kept listing to her babbling which may or may not have been actually directed towards him, as two more stations passed by they both were yet to oblige any of the empty seats of the metro that are viciously fought for during the busy hours. She was telling about her friends, who had come with their boyfriends on bikes. She was to take an auto from the theater back home only to realize that it was one of those days that the city’s auto drivers were on strike. A couple of them that were there asked some insane amount for a journey of just a few kilometers. She was in no mood to entertain them and be broke all month through. When threatening them with police complaint for refusing to take a female to her destination at late hours did not budge them, she decided to take the metro. Her house was quite close by to the metro station which was just 5 stations away and if she hurried she would catch atleast the last metro home. This brought Ravi to the realization that his good times were soon to be over as one of the next two stoppages will be the last of the most amazing journey he had. But then what more could he hope for, he hadn’t really become a brave knight in the shining armour for battling a metro door for her that she would grace him with her phone number or something. That’s getting a bit too ‘filmy hopeful’ he thought; but then she took out her cellphone. Was it to be a day of fortunate circumstances for Ravi like never before in his otherwise ordinary life? But his hopes were diminished within seconds as she had taken it out only to receive her mother’s call. She assured her mother she was safely on her way back and barely a station away and no she didn’t need her ‘good-for-nothing’ brother to come pick her up at the station; though in the end she accepted that she would take a rickshaw. ‘Sibling rivalry’, Ravi thought amusingly; remembering his own little sister back home.

By the time she had finished with the call the train was languidly entering the station she had been intended for. A thought came to Ravi’s mind- should he offer to accompany her to her home or atleast to the rickshaw stand till she gets a rickshaw. Ravi’s own station was still a couple more ahead but he could himself get a rickshaw afterwards or even walk down the remaining 2-3 kilometers. That won’t be an issue. But will that be a bit too bold to ask her? Surely he intended only for her safety at this late hour, but what if she thought otherwise? Who in there days and times are so helpful without any motive? She might take it as an undue offer of assistance or even think that he was making a move. Maybe it was just that tiny bit of his brain that selfishly wanted to extend this amazing journey little longer by accompanying her or the adrenalin which had settled down by now from the door incident that made him hesitant. He heard her say goodbye to him with another one of her mesmerizing smiles; that he wasn’t sure he would get to see any more. A pang of regret set inside Ravi as the metro door started closing behind her. 

Next morning when Ravi woke up he was almost over it, dismissing the incident almost as if it was just a beautiful dream – half remembered, half forgotten. He picked up the newspaper as per his daily morning ritual. As Ravi turned the paper and started reading the little piece at the bottom, a dreadful regret crept inside him, choking him. If only he had been bold enough in the end, if only he had gone with her, if only he hadn’t been so mesmerized by her that he had lost awareness of his surrounding so much so that he failed to notice the three rowdy drunk boys couple of bogeys behind them, he could’ve given her a fighting chance, he could’ve saved her from being just another number in the ever increasing rape statistics of the city, from being yet another candle at the India Gate, from being just a false name without a face – a face that Ravi was all too familiar with, only what was left of her with him with his regret(s).

होली है।


आओ खेलें होली है
इलेक्शन के मौसम में
राजनैतिक रंगो की खुली पोटली है
ऐक फेंके केसरिया तो दुजे ने पलट झाडू चलाई है
भांग में  मलंग पप्पू भी नाचे
लाल, नीला, पीला, हरा मिलके नये रंगो का गठजोड़ बनाये है!
कीचड़  भी खूब उछल रहा,
मीडिया गुब्बारे भरे है,
जनता को कोई मूरख न समझे,
हाथ उसके वोट की पिचकारी है! 

Aao khele holi hai...
Election k mausam me,
Rajnitik rango ki khuli potli hai...
Ek feke kesaria to duje ne palat jhadoo chalai hai ...
Bhang me malang pappu bhi nache tata thaiya,
Lal, nila, pila, hara milke naye rango ka gathjor banaye hai!
Kicchar bhi khub uchal raha,
Media k gubbare bhari hai...
Janta koi murakh na samjhe,
Hath uske vote ki pichkari hai!

Sunday, March 24, 2013

कूड़े के ढेर का पेड़... Kude Ke Dher Ka Ped...


कूड़े के ढेर में खड़ा सूखी टहनियों  से  भरा  वो  एक  पेड़...
मानो  यूँ कोई  ज़िन्दगी तलाशता हुआ मौत की देहलीज़ पर।
देख के लगता है याद करता है वो वक़्त जब पतझर के दिन भी बहार होते थे...
पास उसके एक बाज़ार लगता था, जिसकी चहल-पहल से उसकी शामें खुशहाल  होती थी।।

Kude ki dher me khada sukhi tahnio se bhara wo ek ped...
Mano yun koi zindagi talashta maut ki dehliz par!
Dekh k lagta hai yaad karta hai wo waqt jab patjhar k din bhi bahaar hote the...
Pas uske yun ek bazar lagta tha, jiski chahal-pahal se uski shamein khushhal hoti thi!!

कभी उसकी टहनियों पे बर्तन तो कभी खिलोने लटकते थे,
आज तो खुद की पत्तियों के भी निशां नहीं मिलते!
अब न वो क्रेता रहे न वो विक्रेता, कभी कभी मिल जाता है वो एक बुढ़ा कुड़ेवाला...
मगर उस गरीब के लिए तो है बस कूड़े का ही मोल, बूढ़े पेड़ से क्यूँ बोले वो दो मीठे बोल?
रहते है उस कबाड़खाने में कुछ जानवर...कुत्ते, चूहे, सांप, छछुंदर...
पर वो भी नहीं भटकते उसके आस-पास, मौत की मनहूसियत की गंध आती होगी उन्हें शायद।।

Kabhi uski tahniyon pe bartan to kabhi khilone latakte the,
Aj to khud ki pattion ke bhi nishan nahi milte!
Ab na wo kreta(buyers) rahe na vo vikreta(sellers), 
kabhi kabhi mil jata hai wo ek budha kudewala...
Magar us gareeb k liye to hai bas kude ka hi mol, budhe ped se kiu bole wo do mithe bol?
Rahte hai us kabarkhane me kuch janwar...Kutte, chuhe, sanp, chachundar...
Par wo bhi nahi bhatakte uske aas-pas, maut ki manhusiyat ki gandh ati hogi unhe shayad!!


पर फिर भी आस नहीं मरी है अब तक उसकी, पास ही कहीं लगता है वो बाज़ार अब भी …
वोही चहल-पहल कुछ ऐसे बुलाती है उसे, जवां बसंत की याद दिलाती है उसे!
उम्मीद है उसे फिर उसी रौशनी में डूब जाने की, इन अंधेरो से निकलने की…
इस बसंत ने सूखा ही रखा तो क्या, उम्मीद है उसे आने वाले बारिश के बूंदों की… 
ज़िन्दगी फिर से जीने की!!!

Par fir bhi aas nahi mari hai ab tak uski, pas hi kahi lagta hai wo bazar ab bhi...
Wohi chahal-pahal kuch aise bulati hai use, jawa basant ki yaad dilati hai use!
Ummeed hai use fir usi roshni me dubne jane ki, in andhero se nikalne ki...
Is basant ne sukha hi rakkha to kya, umeed hai use ane wale barish ki bundo ki...
Zindagi fir se jeene ki!

Tuesday, January 1, 2013

Happy New Year!!!



Thousand wishes..Millions hopes...that's what New Year brings to you...
Like a seasoned politician, it spell-binds you in the web of many unfulfilled promises...
Not just that it makes you its own, with a string of broken resolutions...
New Year is nothing but a lie, a conceived notion called time...
Just like the assurances we give to ourselves and others...

There will be a tomorrow to look forward...
We shout, we scream...we protest on the streets...after-all we are students of 3 monkeys...
Nothing changes..nothing ever will...corruption and lechery has been seeded to our genes ...
We will just celebrate New Years,
A facade to forget that we are failures and villains of our own lives...
Only thing changes is the calender year!!!